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29 min

2021

HI

उस के ख़याल की नुमूद अहद-ब-अहद जावेदाँ बस ये कहो कि 'जौन' है ये न कहो कि मर गया चूँकि जौन एक क़ाबिल-ए-एहतिराम शख़्सियत हैं इसलिए उनकी गुमशुदगी को उनकी मर्ज़ी माना जाएगा और इस वाक़ए को भी उनमें गिना जाएगा जो अपने आप हो जाते हैं। Written by Mohd Aqib

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30 min

2021

HI

निदा का कलाम एक तहज़ीबी विरासत की जदीद बाज़गश्त है। इसमें हर उस आदमी का दुःख शामिल है जिसे नए समाज में जगह बनाने के लिए अपनी जड़ों से कट जाना पड़ा है। ये अपने आप में अपनी मंज़िल भी है और अपना सफ़र भी। नैनों में था रास्ता हृदय में था गाँव हुई न पूरी यात्रा छलनी हो गए पाँव Written by Mohd Aqib

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34 min

2021

HI

ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है अभी तुझ से मिलता-जुलता कोई दूसरा कहाँ है क़ुदरत ख़ूबसूरत है और ख़ौफ़नाक है; ये बात घर में आग लगाने वालों को समझ में नहीं आती। हुआ यूं कि क़ौमी दंगे में बशीर बद्र के घर को आग के हवाले कर दिया गया । उस दौरान ऐसा बहुत कुछ जलकर राख हो गया जो इंसान के काम आ सकता था मगर इश्क़-नगर में ग़ुस्से का रिवाज नहीं है। मुहब्बत ने सब्र किया और बशीर बद्र ने शेर कहे । 1999 में बशीर बद्र को पद्मश्री से नवाज़ा गया। Written by Mohd Aqib

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30 min

2021

HI

घर में था क्या कि तेरा ग़म उसे ग़ारत करता वो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-तामीर सो है तेरह बरस की उम्र में उमराओ बेगम के साथ मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ाँ 'ग़ालिब' की शादी हुई। इसके बाद ग़ालिब अपने छोटे भाई मिर्ज़ा यूसुफ़ के साथ दिल्ली आ गए। दिल्ली : जिसने आख़िर में अपने हाकिम बहादुर शाह ज़फ़र को दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीन भी नहीं मुहय्या की, उसी से ग़ालिब को अपने रुतबे की क़द्र की उम्मीद थी। Written by Mohd Aqib

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36 min

2021

HI

ज़िक्र है हज़रत अमीर ख़ुसरो का, जो फ़ारसी ज़बान के महान शायर थे, साहित्य-कार थे, संगीत-कार थे, भारत की सबसे बड़ी और ख़ूबसूरत आवाज़ यानी हिन्दी और उर्दू ज़बानों की बुनियाद रखने वाले थे। सात-सात बादशाहों के दरबारों के ओहदे दार होने के बावजूद सच्चे सूफ़ी संत थे, फ़िलॉस्फ़र थे, समाज सुधारक और हमारी सबसे बड़ी पहचान हिन्दू-मुस्लिम मुश्तरका तहज़ीब यानी सांझी संस्कृति के विकास में जिनका योगदान सबसे ज़्यादा है। Written by Farooq Argali

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30 min

2021

HI

उर्दू की तरक़्क़ी पसन्द शायरी की तारीख़ में कई अहम नाम हैं जिन्होंने सरमायादारी, जब्र, इस्तेहसाल यानी कमज़ोरों का शोषण, नाबराबरी और नाइंसाफ़ी के खिलाफ़ अपनी शायरी के ज़रिये इंक़लाबी आवाज़ बुलन्द की, इनमें जोश मलीहाबादी, असरारुल हक़ मजाज़, अली सरदार जाफ़री, मख़दूम मुहीउद्दीन, हबीब जालिब, एहसान दानिश, साहिर लुधियानवी और कैफ़ी आज़मी वगैरह को बेपनाह शोहरत हासिल है लेकिन अपने वक़्त की इन सभी इंक़लाबी शख़्सियतों में जो आवाज़ सबसे बुलंद, सबसे सुरीली, सबसे ज़्यादा असरदार और कानों और आंखों के रास्ते से इंसानी दिल...

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33 min

2021

HI

उर्दू ज़बान के लफ्ज़ साहिर का मतलब है 'जादूगर'। साहिर लुधियानवी सचमुच ऐसे जादूगर थे जिनकी शायरी और फ़िल्मों का जादू न सिर्फ़ उर्दू अदब, हिन्दी साहित्य और बालीवुड बल्कि सारी दुनिया के सर चढ़ कर बोल रहा है। Written by Farooq Argali

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29 min

2021

HI

क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़ जान का रोग है बला है इश्क़ मीर की उम्र कोई 11-12 बरस की रही होगी जब उनके पिता का देहांत हो गया। बड़ी मुश्किल से दफ़ीने का सामान इकठ्ठा हुआ। चूँकि वालिद एक सूफ़ी फ़क़ीर थे और सूफ़िज़्म में इश्क़ बुनियादी हैसियत रखता है इसलिए इश्क़ मीर की ज़िन्दगी का पहला सबक़ था; जो उन्हें अपने पिता से ही हासिल हुआ। आने वाले वक़्तों में इश्क़ का ये फ़लसफ़ा मीर की ज़िन्दगी और शख़्सियत का ख़मीर बनने वाला था। Written by Mohd Aqib

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31 min

2021

HI

दुष्यन्त सिर्फ़ अपने होने में मुकम्मल बयान है। और उसके माथे पर चोट का गहरा निशान उसका जमाल है। ये गहरा निशान ख़ुद में सदियों पर फैली हुई इन्सानी दुःख दर्द की आहें समाए, अपनी ज़ात में रौशन है। ये गहरा निशान जब भी शाइरी में दाख़िल होता है तो ज़ुल्म सहते इन्सान के गले से अपने आप फूट पड़ता है। वो सूर्य का स्वागत भी करता है और एक कंठ विशपायी भी, वो साये में धूप भी चुनता है और आवाज़ों के घेरे में क़ैद होकर रोता भी है, आज़ादी की पुकार भी बनता है। वक़्त के थपेड़े सहते हुए इन्सान के अंदर का ज्वालाम...

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33 min

2021

HI

फ़िराक़ की माँ कहती थीं कि बचपन की मासूमियत में भी फ़िराक़ इसका इन्तेख़ाब करते थे कि किसकी गोद में जाना है और किससे गुरेज़ करना है। अगर यक़ीन किया जाये तो फ़िराक़ में हुस्न की एक फ़ितरी परख थी जो आगे चल कर इल्मी और अदबी शऊर का ज़रिया बन गयी। Written by Mohd Aqib

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