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1905

HI

राजनीतिक, प्रशासनिक भ्रष्टाचार के पूरे तंत्र को खोलनेवाला, बच्चों की चीख़-सा दर्दनाक नाटक ‘जादू का कालीन’ ‘ऐसा एक पेच है’ जहाँ सब मिलकर हमारी निर्ममता को बेनक़ाब करते हैं**।** इसमें पात्र बच्चे हैं पर नाटक वयस्कों के लिए है क्योंकि वही हैं जिन्हें इस निर्ममता का प्रतिकार करना है**।**सारी विसंगति मानवीय विडम्बना, पाखंड के बीच मृदुला गर्ग ने फैंटेसी की लय को पकड़ा है**।** यह उनकी नाट्यकला का नमूना है कि वे निर्ममताओं के बीच बच्चों की उड़नछू प्रवृत्ति को नहीं भूलतीं**।** जिस कालीन को बु...

1905

HI

जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है...

1905

HI

रचनात्मकता का पल्लवन बेल की तरह आधार चाहता है, भले ही कैसा भी हो बस आकाश की ओर अवलम्बित, जिसके सहारे ऊँचाइयाँ पाई जा सकें। ‘मैं और मैं’ इन्हीं भटकाते आधारों का अन्तर्द्वन्द्व है। मृदुला गर्ग का यह उपन्यास अपने भीतर के जगत को सच की तपिश से बचाने की प्रवृत्ति को भी रेखांकित करता है, क्योंकि सत्य से साक्षात्कार करें तो भीतर अपराधबोध पनपता है और झूठ में शरण लेने की लालसा...।‘मैं और मैं’ कहानी है मृदुला गर्ग के दो कलात्मक और सशक्त पात्रों—कौशल कुमार और माधवी—के बनतेटूटते सामाजिक और नैति...

1905

HI

‘वसु का कुटुम’ लेखिका की अब तक लिखी गई कहानियों से एकदम अलग हटकर है। अलग इसलिए कि अभी तक उनकी लगभग सारी कहानियाँ मुख्य रूप से स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के कथ्य के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं लेकिन पहली बार हमारा साक्षात्कार एक बड़े सामाजिक परिवेश और उससे जुडी रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी समस्याओं से होता है। उदाहरण के लिए पर्यावरण, अतिक्रमण, एन.जी.ओ., कालाधन और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे जिनसे हममें से हरेक को प्रतिदिन दो-चार होना पड़ता है। यदि लेखिका ने कथ्य के स्तर पर एक नई पगडंडी पर क़दम रखा है तो उसी के ...

1905

HI

‘बिसात : तीन बहनें तीन आख्यान’ एक अनूठी कथा-कृति है। कथा-साहित्य में विख्यात मंजुल भगत, मृदुला गर्ग और अचला बंसल तीनों सगी बहनें हैं। मंजुल भगत अब हमारे बीच नहीं हैं। मृदुला गर्ग व अचला बंसल निरन्तर सक्रिय हैं। तीनों के लेखन की पृथक् पहचान होने के बावजूद कुछ सूत्र ऐसे हैं जिन पर साझा अनुभवों के विविध रंग दिख जाते हैं। मृदुला गर्ग के शब्दों में, ‘तीनों के काफ़ी अनुभव साझा रहे। ज़िन्दगी में कितने ऐसे किरदार थे, जिनसे तीनों का साबका पड़ा। कितने ऐसे हालात थे, जिनका तीनों ने नज़ारा किया! साझा अन...

1905

HI

परम्परागत भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के बीच मानवीय स्वतंत्रता, ख़ासकर नारी-स्वातंत्र्य का सवाल सदा ही अनदेखा किया जाता रहा है, और मृदुला गर्ग का यह उपन्यास परम्परागत ही नहीं, बल्कि आधुनिकता के घिसे-पिटे वैचारिक चौखटे से भी बाहर निकलकर यह सवाल उठाता है कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का आधार क्या है—प्रेम अथवा स्वतंत्रता? और क्या इन सम्बन्धों का सत्य सिर्फ़ मनोगत है अथवा इनके समानान्तर कोई दैहिक सच्चाई भी है?देखा जाए तो मृदुला गर्ग का यह बहुचर्चित उपन्यास एक त्रिकोणात्मक प्रेम...

1905

HI

‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित मृदुला गर्ग का कथा-संसार विविधता के अछोर तक फैला हुआ है। उनकी कहानियाँ मनुष्य के सारे सरोकारों से गहरे तक जुड़ी हुई हैं। समाज, देश, राजनीतिक माहौल, सामाजिक वर्जनाओं, पर्यावरण से लेकर मानव मन की रेशे-रेशे पड़ताल करती नज़र आती हैं। इस संकलन की कहानियाँ अपने इसी ‘मूड’ या मिज़ाज के साथ प्रस्तुत हुई हैं।मृदुला गर्ग की कहानियाँ पाठक के लिए इतना ‘स्पेस’ देती हैं कि आप लेखक को गाइड बना तिलिस्म में नहीं उतर सकते, इसे आपको अपने अनुसार ही हल करना पड़ता है...

2017

EN

‘Your story has left me gasping. Though I did not remember the ferocious details, I had a fairly strong recollection of the incandescent feelings expressed in it. But I wasn’t prepared for the full burst of passion shown by the lovers, and the fitting, though brutal, end. […] When did you write it? No, don’t tell me. I know you wrote it soon after I left India. But let me assure you, dearest Maya, that the passion still abides with me… or shall I say, with us…’Almo...

47,08 kr.

1905

HI

मृदुला गर्ग ने लगभग आधी सदी से अपनी निरंतर ऊर्जस्वित रचनात्मकता के कारण, हिन्दी कथा-साहित्य में अनोखा मुक़ाम हासिल किया है। जीवन के किसी एक पहलू तक ही सीमित रहने के बजाय उन्होंने कथ्य और शिल्प दोनों में लगातार नवोन्मेष किए हैं। ये नवोन्मेष सायास साधी गई और प्रदर्शनप्रिय चमत्कारिकता के रूप में नहीं हैं। ये तो सहज विकास के तौर उनके विषयों के चुनाव और निर्वाह में रच-बस गए हैं। आरंभिक दौर में लिखी गई कितनी क़ैदें और 2014 में लिखी गई सितम के फ़नकार को साथ-साथ पढ़ने से यह बात स्पष्ट हो जाती है।

Uforkortet

6 timer 7 min

2020

HI

साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित लेखिका मृदुला गर्ग अपनी साहसिक अभिव्यक्ति और उतने ही साहसिक व्यक्तित्व के लिए जानी जाती हैं. 'चितकोबरा' के प्रकाशन के बाद उन्होंने सेन्सरशिप और गिरफ़्तारी का बहादुरी से मुक़ाबला किया. वे इसके अलावा 'कठ गुलाब', 'अनित्य', 'मिल जुल मन' जैसी कृतियों की रचयिता हैं जिनका अंग्रेज़ी समेत कई भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है.

55,00 kr.

2025

HI

हिंदी में निबंध लेखन की स्वस्थ परंपरा रही है। साहित्य का मनोसंधान उसी की दिलचस्प व पठनीय कड़ी है। कथा साहित्य में लेखक वस्तुस्थिति के समांतर एक संसार रचता है; निबंध में उससे सीधे मुठभेड़ करता है। दोनों तरह के लेखन का प्रमुख स्वर, भिन्न नज़रिया और प्रचलित मान्यता से प्रतिरोध हो सकता है, जो मृदुला गर्ग का है। निबंध में उसकी अभिव्यक्ति के लिए स्वरचित किरदारों का सहारा नहीं लेना पड़ता। तथ्यों की आँखों में आँखें डाल कर उनकी मनोवैज्ञानिक पड़ताल की जा सकती है। समाज, व्यवस्था और व्यक्ति क...

19,75 kr.